सिंगर कैसे बने – गायक कैसे बने- How to be a Singer

कहा जाता है कि अच्छा गला और अच्छी आवाज़ इश्वर की देन होते हैं | मगर इसका मतलब ये नहीं है कि अगर आप की आवाज़ मधुर नहीं है तो आप गायन नहीं कर सकते या सिंगर नहीं बन सकते | आज की इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको यही बताने जा रहे हैं की आप सिंगिंग के फील्ड में अपना करियर कैसे संवार सकते हैं | कई लोग ये पूछते हैं कि सिंगर कैसे बने या गायक कैसे बने | दोस्तों सिंगिंग या गायन एक बहुत बड़ा क्षेत्र है | इस पोस्ट के माध्यम से हम सिंगिंग में करियर कैसे बनाये इसकी जानकारी देंगे | गायक कैसे बने – सिंगिंग कैसे सीखे – गाना गाने सीखने के लिए टिप्स

गायन हर किसी में यह विशेषता नहीं होती हैं। संगीत को भगवान की दें मानी जाती है और ऐसा सोंचा जाता है की जिसपे भगवान की कृपा होती है वही गा सकता है. परन्तु ईश्वर ने सबको अपनी कर्मठता से अपने सपने साकार करने की शक्ति दी है. अगर आपका गला और आवाज़ साधारण भी है, तो भी जबरदस्त रियाज़ करके आप अपनी आवाज़ में न सिर्फ नयी जान ला सकते है बल्कि संगीत की बुलंदियों को छू सकते हैं. गायन में बेहतर बनने के लिए दैनिक अभ्यास की जरूरत होती है।

सिंगिंग कितने प्रकार की होती है – Type of Singing

  • हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में निम्न गायन के प्रकार प्रचलित हैं – ध्रुवपद, लक्षण गीत, टप्पा, सरगम, कव्वाली, धमार, ठुमरी, तराना, भजन, गीत, खयाल, होरी, चतुरंग, गज़ल, लोक-गीत, नाट्य संगीत, सुगम संगीत, खटके और मुरकियाँ ।
    • ध्रुवपद – गंभीर सार्थ शब्दावली, गांभीर्य से ओतप्रोत स्वर संयोजन द्वारा जो प्रबन्ध गाये जाते हैं वे ही हैं ध्रुवपद। गंभीर नाद से लय के चमत्कार सहित जो तान शून्य गीत हैं वह है ध्रुवपद। इसमें प्रयुक्त­ होने वाले ताल हैं – ब्रम्हताल, मत्तताल, गजझंपा, चौताल, शूलफाक आदि। इसे गाते समय दुगनी चौगनी आड़ी कुआड़ी बियाड़ी लय का काम करना होता है।
    • लक्षण गीत – राग स्वरूप को व्य­क्त करने वाली कविता जो छोटे ख्याल के रूप में बंधी रहती है लक्षण गीत कहलाती है।
    • टप्पा – टप्पा का अर्थ है निश्चित स्थान पर पहुंचना या ठहरी हुई मंजिल तय करना। गुजरात, काठियावाड से पंजाब, काबुल, बलोचिस्तान के व्यापारी जब पूर्व परम्परा के अनुसार ऊंटों के काफिलों पर से राजपुताना की मरुभूमि में से यात्रा करते हुए ठहरी हुई मंजिलों तक पहुंचकर पड़ाव डाला करते थे, उस समय पंजाब की प्रेमगाथाओं के लोकगीत, हीर-राँझा, सोहिनी-महिवाल आदि से भरी हुई भावना से गाये जाते थे। उनका संकलन हुसैन शर्की के द्वारा हुआ। शोरी मियां ने इन्हें विशेष रागों में रचा। यही पंजाबी भाषा की रचनाएँ टप्पा कहलाती हैं। टप्पा, भारतीय संगीत के मुरकी, तान, आलाप, मीड के अंगों कि सहायता से गाया जाता है। पंजाबी ताल इसमें प्रयुक्त होता है। टप्पा गायन के लिये विशेष प्रकार का तरल, मधुर, खुला हुआ कन्ठ आवश्यक है, जिसमें गले की तैयारी विशेषता रखती है।
    • सरगम – स्वरों की ऐसी मधुर मालिका जो कर्णमधुर एवं आकर्षक हो और राग रूप को स्पष्ट कर दे वही सरगम है। इसे आलाप के बजाय स्वरों का उच्चार करते हुये गाया जाता है।
    • कव्वाली – कव्वाली नामक ताल में जो प्रबंध गाया जाता है वह है कव्वाली। विशेषकर मुस्लिम भजन प्रणाली जिन्हें खम्सा और नात् कव्वाली कहते हैं।
    • धमार – धमार नामक ताल में होरी के प्रसंग के गीत जो कि ध्रुवपद शैली पर गाये जाते हैं, धमार कहलाते हैं।
    • ठुमरी – राधाकृष्ण के या प्रेम की भावना से परिपूर्ण श्रंगारिक गीत जिसका अर्थ मिलन अथवा विरह की भावना में लिपटा रहता है, खटकेदार स्वरसंगतियों और भावानुकूल बोल आलापों एवं बोलॅतानों से सजाते हुए अर्थ सुस्पष्ट करके गाया जाता है उसे ठुमरी कहते हैं। लखनऊ, बनारस तथा पंजाब शैली की ठुमरियां अपनी अपनी विशेषता से परिपूर्ण होती हैं। इसमे प्रयक्त होने वाले ताल हैं पंजाबी, चांचर, दीपचंदी, कहरवा और दादरा आदि।
    • तराना – वीणा वादन के आघात प्रत्याघातों को निरर्थक दमदार बोलों द्वारा व्यक्त करते हुए वाद्य संगीत कि चमाचम सुरावट कंठ द्वारा निकालना और लय के बांटों का रसभंग न होते हुए सफल प्रदर्शन तराना गायन की अविभाज्य विशेषता है। तेज लय में ना ना ना दिर दिरर्रर्र आदि कहने का नाम तराना नही है। वीणावादन का सफल प्रदर्शन कंठ द्वारा होना चाहिये, वही तराना है।
    • भजन – सूरदास, मीरा, तुलसी, युगलप्रिया, प्रताप बाला, जाम सुत्ता, कबीर आदि संतों द्वारा रचे हुए ईश्वर के गुणानुवाद तथा लीलाओं के वर्णन के प्रबन्ध जिन्हे गायन करके आत्मानन्द व आत्मतुष्टि अनुभूत की जाती है उसे भजन कहते हैं। इनके ताल हैं कहरवा, धुमाली, दादरा आदि।
    • गीत – आधुनिक कवियों द्वारा रचे हुए भावगीत जो शब्द अर्थ प्रधान रहते हैं लोकॅसंगीत के आधार पर अर्थानुकूल गाये जाते हैं इन्हें ही गीत कहते हैं।
    • खयाल अथवा ख्याल – ख्याल फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है कल्पना। ख्याल के २ भेद हैं। पहिला है बड़ा ख्याल और दूसरा छोटा ख्याल। बड़ा ख्याल, विलम्बित लय में ध्रुवपद की गंभीरता के साथ गाया जाता है और कल्पना के आधार पर विस्तारित किया जाता है। इसे गाते समय आठों अंगों का व्यवहार समुचित किया जाता है। बड़े ख्याल में प्रयुक्त होने वाले ताल हैं एकताल, तिलवाड़ा, झूमरा, रूपक, झपताल, आड़ा-चौताल, आदिताल आदि।छोटा ख्याल चंचल सरस चमत्कार प्रधान और लय के आकर्षण से परिपूर्ण होता है इसे गाते समय भी आठों अंगों का प्रयोग किया जाता है। त्रिताल, एकताल, झपताल, रूपक और आड़ा-चौताल आदि द्रुतलय में बजाये जाते हैं जो कि छोटे ख्याल में प्रयुक्त होते हैं।
    • होरी – होली के प्रसंग की कविता या गीत जो ठुमरी के आधार पर गाया जाता है, होरी कहलाता है।
    • चतुरंग अथवा चतरंग – चतरंग गीत का ऐसा प्रकार है जिसमें चार प्रकार के प्रबंध दर्शन एक साथ होते हैं, ख्याल, तराना, सरगम और तबला या पखावज की छोटी सी परन, इनका समावेश होता है चतरंग में।
    • ग़ज़ल – उर्दू भाषा की शायरी या कविता गायन को ग़ज़ल गायन कहते हैं। यह शब्द प्रधान, अर्थ दर्शक, गीत प्रकार है जो कि विशेष प्रकार के खटके, मुरकियों आदि से मंडित किया जाता है। इसमें कहरवा, धुमाली, दादरा आदि तालों का प्रयोग किया जाता है।
    • खटके और मुरकियाँ – सुन्दर मुरकियाँ ही ठुमरी की जान है। मुरकी वह मीठी रसीली स्वर योजनाएँ हैं, जो मधुर भाव से कोमल कंठ द्वारा ली जाती हैं। जबकि खटके की स्वर योजनाएँ भरे हुए कंठ द्वारा निकाली जाती हैं। यही मुरकी और खटके में भेद है।
    • लोक-गीत – यह संगीत दूर दराज के गावों में गाया जाता है, और इसके अनेक रूप विविध भाषाओं में देखने को मिलते हैं। चैती, कजरी आदि लोकगीत के रूप हैं।
    • नाट्य संगीत – नाटकों में गाया जाने वाला संगीत नाट्य संगीत कहलाता है।
    • सुगम संगीत – शास्त्रीय संगीत से सुगम अथवा सरल संगीत, सुगम संगीत कहलाता है। इसमें गाई जाने वाली विधाएँ हैं गीत, गजल, भजन, कव्वाली, लोक-गीत इत्यादि।

सिंगिंग कहाँ से सीखे

गायन हमेशा अच्छे और सिद्ध शिक्षण संसथान से ही सीखनी चाहिए| ऐसा संसथान जिसके विद्यार्थियों ने भूतकाल में खूब नाम कमाया हो. जो लोकप्रिय हो | जहाँ की शिक्षा के चर्चे हों | SINGING ME CAREER बनाने के लिए आप किसी म्यूजिक स्कूल या कॉलेज में भी दाखीला ले सकते हैं जहाँ से आपको प्रवीण या प्रभाकर जैसी गायकी की उपाधियाँ मिल सकती हैं | हम यहाँ कुछ म्यूजिक सिखाने वाले प्रतिष्ठित संस्थानों के नाम बता रहे हैं |

इसके अतिरिक आप क्लासिकल सिंगिंग सिखने के लिए अलग अलग क्षेत्रीय स्तर के घराने से भी संगीत की तालीम ले सकते हैं | भारतीय संगीत में संगीत शिक्षा एक कंठ से दूसरे कंठ में ज्यों की त्यों उतारी जाती है। जिसे नायकी ढंग की शिक्षा कहते हैं। और जब एक ही गुरू के अनेक शिष्य हो जाते हैं तो उन्हें घराना या परम्परा कहा जाता है। किराना घराना, ग्वालियर घराना, आगरा घराना, जयपुर घराना इत्यादि घराने भारतीय संगीत में प्रसिद्ध हैं।

सिंगर कैसे बने- How to be a singer – गायक कैसे बने

अगर आप  सिंगिंग सीखना चाहते हैं तो  आप सिख सकते हैं | सिंगिंग या सिंगर बनना एक बहुत अनुशासन का काम है | एक अच्छा सिंगर बनने के लिए आपको निचे दी हुयी बातो का बहुत ध्यान देना पड़ेगा

दृढ़ निश्चय रखे :बाहर की दुनिया में काफी ज्यादा  प्रतिस्पर्धा है – हजारों लोग एक सफल गायन पेशे की प्रसिद्धि  एवं नाम पाने की ख्वाहिश  रखते हैं   और उसे पाना चाहते है। सफल बनने के पहले अधिकांश गायक अपने आवाज पर काम करने के लिए कई साल लगा देते हैं और उन दिनों में वो कम पैसों में अपना काम चलाते है। इसीलिए अगर आप भी सिंगर बनना चाहते हैं तो अपने लक्ष्य से दृष्टि ना हटने दें और अपनी सहनशीलता को आखिरी चरण तक बनाये रखें। आप को कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता

डर पर जीत दर्ज करें: कई  कलाकार ऐसे हैं जिन्हें मंच पर गायन से भय लगता है और वो कई वर्षों तक उसी  भय के साथ संघर्ष करते है। यदि यह आपकी भी यही समस्या है, या फिर दूसरों की पसंद में बनने में आपको दिक्कते आ रही है, तो अपने डर का सामना करने तथा अपना आत्मविश्वास को बढ़ाये | अक्सर दूसरों के सामने गाते रहें, चाहे दोस्तों के साथ कार में हो या फिर मंच पर| अपने डर पर जीत हासिल करने का सबसे आसान तरीका होता है अपने डर को उभारना और मगर उसे हावी न होने देना एक बार जब  गाना आप अच्छे से गाना शुरू कर लेंगे, इसके बाद अगले गाने पर कार्य करे, यह सब करते हुए आपको पता भी नहीं चलेगा और आपके पास रात भर गाने के लिए एक विस्तृत सूची होगी। और ये कोशिश करते करते आपका डर आप से हार जायेगा

रियाज़ या प्रैक्टिस पर फोकस करे : बगैर रियाज़ तो सिंगिंग बस एक कल्पना मात्र है | एक से एक उस्तादों को वर्षो लग गए नाम कमाने में मगर आज भी वो घंटो रियाज़ करते हैं | गायकी का रियाज़ वस्तुतः गायन का शोध होता है |

खट्टी और तीखी चीजों का परहेज़ करे : अगर आप चाहते हैं की आपका गला बरसों आपका साथ दे तो आपको खट्टी चीजों से बहुत दूर रहना चाहिये |

यूट्यूब  चैनल स्टार्ट करे : अपने गानों के लिए अपना खुद का यौतुबे चैनल स्टार्ट करे और लोगो को उस चैनल से जोड़े | नाम और पैसे दोनों पाने के लिए यू ट्यूब चैनल एक बेहतर तरीका है |

रियलिटी शो में भाग लेते रहे : रियलिटी शो में भाग लेने के किसी मौके को न छोड़े | अकेले में बेहतरीन म्यूजिक और अच्छे सिंगर को सुने | अपने आस पास हो रहे किसी संगीत प्रतियोगिता में अवश्य भाग ले |

योग करे और गर्म पानी का सेवन : योग करना और गर्म पानी का प्रयोग भी करना आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा

ये हैं गायकी के आठ अंग – सिंगर कैसे बने

अष्टांग गायकी

सिंगर कैसे बने इस बात को समझने के लिए आप को सिंगिंग या गायन के मूल तत्व को समझना पड़ेगा | वातावरण पर प्रभाव डालने के लिये राग मे गायन, वादन के अविभाज्य 8 अंगों का प्रयोग होना चाहिये। ये 8 अंग या अष्टांग इस प्रकार हैं – स्वर, गीत, ताल और लय, आलाप, तान, मींड, गमक एवं बोलआलाप और बोलतान। दिए गए  8 अंगों के अच्छी  प्रयोग से ही राग को सजाया जाता है।

  • स्वर -आपने स्वर या सुर के बारे में कई बार सुना होगा | आखिर ये सुर या स्वर क्या है | स्वर एक निश्चित ऊँचाई की आवाज़ का नाम है। यह कर्ण मधुर आनंददायी होती है। जिसमें स्थिरता होनी चाहिये, जिसे कुछ देर सुनने पर मन में आनंद की लहर पैदा होनी चाहिये। यह अनुभूति की वस्तु है। सा, रे, ग, म, प, ध और नि जिन्हें क्रमश: षडज, ऋषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद के नाम से ग्रंथों में वर्णित किया गया है। 12 स्वरों के नाम इस प्रकार हैं – सा, रे कोमल, रे शुद्ध, ग कोमल, ग शुद्ध, म शुद्ध, म तीव्र, पंचम, ध कोमल, ध शुद्ध, नि कोमल और नि शुद्ध।
  • गीत, बंदिश – बंदिश, परम आकर्षक सरस स्वर में डूबी हुई, भावना प्रधान एवं अर्थ को सुस्पष्ट करने वाली होनी चाहिये। गायक के कंठ द्वारा अपने सत्य रूप में अभिव्यक्त होने चाहिये गीत।
  • ताल – ताल एक निश्चित मात्राओं मे बंधा और उसमे उपयोग में आने वाले बोलों के निश्चित् वज़न को कहते हैं। मात्रा (beat) किसी भी ताल के न्यूनतम अवयव को कहते हैं। हिन्दुस्तानी संगीत प्रणाली में विभिन्न तालों का प्रयोग किया जाता है। जैसे, एकताल, त्रिताल (तीनताल), झपताल, केहरवा, दादरा, झूमरा, तिलवाड़ा, दीपचंदी, चांचर, चौताल, आडा-चौताल, रूपक, चंद्रक्रीड़ा, सवारी, पंजाबी, धुमाली, धमार इत्यादि।
  • आलाप अथवा बेहेलावे – आकार में स्वर की ताकत और आवश्यक भाव धारा बहाने के लिये, धीमी गति से, ह्रदयवेधी ढंग से, जो राग स्वरों के छोटे-छोटे स्वर समूह, रुकते हुए लिये जाते हैं वे ही आलाप हैं। मींड प्रधान सरस स्वर योजना ही आलाप का आधार है।
  • तान – राग के स्वरों को तरंग या लहर के समान, न रुकते हुए, न ठिठकते हुए सरस लयपूर्ण स्वर योजनाएं तरंगित की जाती हैं वे हैं तानें। मोती के दाने के समान एक-एक स्वर का दाना सुस्पष्ट और आकर्षक होना चाहिये, तभी तान का अंग सही माना जाता है।
  • मींड – मींड का अर्थ होता है घर्षण, घसीट। किसी भी स्वर से आवाज़ को न तोडते हुए दूसरे स्वर तक घसीटते हुए ले जाने कि क्रिया को मींड कहते हैं। सुलझे हुए मस्तिष्क और स्वर संस्कारित कंठ की चरम अवस्था होने पर ही मींड कंठ द्वारा तय होती है।
  • गमक – मींड के स्वरों के साथ आवश्यक स्वर को उसके पिछले स्वर से धक्का देना पड़ता है ऐसी क्रिया को गमक कहते हैं।
  • बोल-आलाप बोल-तान – आलाप तानों में लय के प्रकारों के साथ रसभंग न होते हुए भावानुकूल अर्थानुकूल गीत की शब्दावली कहना ही बोल-आलाप बोल-तान की अपनी विशेषता है।

ऊपर लिखे हुए टिप्स को अपना कर आप अपना सिंगिंग में करियर बना सकते हैं | आप दूसरे को टिप दे सकते हैं कि सिंगर कैसे बने | तो दोस्तों ये थी जानकारी कि सिंगर कैसे बने या गायक कैसे बने  | उम्मीद है कि आप को ये जानकारी पसंद आई होगी

kaisebane

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  • Thanks sir mai aapse puchhna chahta hu ki mera age 19 years ka hai kya mai abhi se singing sikh kar ek achha singer ban sakte hai mujhe singing me bahoot intrest hai mai ek success singer banana chahta hu or mai iske liye apni puri jan se koshish karoonga

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kaisebane

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